Monday, 3 October 2011

अथ अर्गलास्तोत्रम्






अथ अर्गलास्तोत्रम्

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी |

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ||१|| 

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि |

जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ||२||

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि||३||

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः|

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि||४||

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||५||

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||६||

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||७||

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||८||

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||९||

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||१०||

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||११||

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||१२||

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्च्कैः|

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||१३||

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||१४||

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||१५||

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||१६||

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||१७||

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||१८||

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||१९||

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||२०||

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||२१||

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||२२||

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||२३||

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||२४||

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः |

स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्प्दाम् ||२५||

 इति अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम् |  

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