कवित्त
नन्दी की सवारी नाग अङ्गीकर धारी नित,सन्त सुखकारी नीलकंठ त्रिपुरारी हैं|
गले मुण्डमाला भारी,सिर सोहै जटाधारी, वाम अंग में विहारी,गिरिजा सुतवारी हैं||
दानी बड़े भारी शेष शारदा पुकारी, काशीपति मदनारी कर शूल चक्रधारी हैं|
कला उजियारी लख देव सो निहारी,यश गावैं वेद चारी सो हमारी रखवारी हैं||१||
शम्भु बैठें हैं मृगछाला अंग हो रहे निहाला,पीवें भंग का पियाला,अहि अंग पे चढ़ाये हैं|
गले सोहे मुण्डमाला कर डमरू विशाला ,अरु ओढें मृगछाला,भस्म अंग में लगाए हैं||
संग सुरभी सुतशाला करै भक्त प्रतिपाला,मृत्यु हरते हैं अकाला शीश जटा को बढ़ाए हैं|
कहे रामलाला करो मोहि तुम निहाला,गिरिजापति आला जैसे काम को जलाए हैं||२||
मारा है जलंधर औ त्रिपुर को संघारा जिन,जारा है काम जाके शीश गंगधारा है|
धारा है अपार जासु महिमा है तीनलोक,भाल सोहै चन्द्र जाकी सुषमा की सारा है||
सारा अहिवात सब खायो हलाहल जानि,जगत के अधारा जाहि वेदन उचारा है|
चारा है भाग जाके द्वार है गिरीशकन्या, कहत अयोध्या सोई मालिक हमारा है ||३||
अष्ट गुरु जानी जाके मुख वेदवानी शुभ,भवन में भवानी सुख सम्पति लहा करै|
मुण्डन की माला जाके चन्द्रमा ललाट सोहे,दासन के दास जाके दारिद दहा करै||
चारों द्वार बंदी जाके द्वारपाल नन्दी,कहत कवि अनन्दी नाहक नर हाहा करै|
जगत रिसाय यमराज की कहाँ बिसाय,शंकर सहाय तो भयंकर कहा करै||४||

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